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✍️शिक्षा के मंदिर में ‘व्यापार’: विद्यालय संचालक कर रहे किसानों के बच्चों का आर्थिक शोषण ,अभिभावकों पर भारी पड़ रही ‘मान्यता’ की धमक; कॉपी-किताब से लेकर ड्रेस तक के नाम पर वसूली का खेल✍️

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​✍️शिक्षा के मंदिर में ‘व्यापार’: विद्यालय संचालक कर रहे किसानों के बच्चों का आर्थिक शोषण ,अभिभावकों पर भारी पड़ रही ‘मान्यता’ की धमक; कॉपी-किताब से लेकर ड्रेस तक के नाम पर वसूली का खेल✍️

‼️जगतपुर ,रायबरेली‼️

​✍️एक ओर सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारों के साथ शिक्षा को सुलभ बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर निजी विद्यालय संचालक शिक्षा को मोटी कमाई का जरिया बना चुके हैं। ताजा मामला क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित विद्यालय का है, जहाँ विद्यालय संचालक द्वारा किसानों और गरीब अभिभावकों की जेब पर सरेआम डाका डाला जा रहा है।

एडमिशन और फीस का ‘भारी’ गणित

शिक्षा के नाम पर हो रही इस वसूली का आलम यह है कि ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश के लिए अभिभावकों से 6400 रुपए तक वसूले जा रहे हैं। इतना ही नहीं, हर महीने 1300 रुपए की भारी-भरकम फीस ने मध्यमवर्गीय और किसान परिवारों की कमर तोड़ दी है। जो किसान दिन-रात खेतों में पसीना बहाकर अपने बच्चों के भविष्य के लिए पैसे जोड़ते हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा स्कूल की इन मनमानी मांगों की भेंट चढ़ रहा है। ड्रेस और किताबों के नाम पर कमीशनखोरी
​खबर है कि विद्यालय प्रबंधन ने अपनी पसंद की दुकानों से कॉपी, किताबें और विभिन्न प्रकार की स्कूल ड्रेस खरीदना अनिवार्य कर रखा है। बाजार से ऊंचे दामों पर बेची जा रही इन सामग्रियों के पीछे मोटा कमीशन होने की चर्चा है। अभिभावकों का कहना है कि “मान्यता” का रौब दिखाकर विद्यालय उन्हें डराता है और विरोध करने पर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ की धमकी दी जाती है।

एनुअल फंक्शन या वसूली का उत्सव?

​हैरानी की बात तो यह है कि 10वीं कक्षा के छात्रों से एनुअल फंक्शन (वार्षिक उत्सव) के नाम पर 3800 रुपए प्रति बच्चा वसूला जा रहा है। एक गरीब अभिभावक के लिए यह राशि जुटाना नामुमकिन सा हो गया है। विद्यालय के इस रवैये से छात्र मानसिक तनाव में हैं और अभिभावक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

मुख्य बिंदु:

​गरीबों का शोषण: किसान और मजदूर वर्ग के बच्चों को निशाना बनाकर की जा रही है वसूली।
​नियमों की अनदेखी: शिक्षा विभाग के मानकों को ताक पर रखकर वसूली जा रही है मनमानी फीस।
​व्यापार बनता स्कूल: विद्यालय अब ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि कमाई का अड्डा बन चुके हैं।
​वर्जन:​”हमें अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा स्कूल को देना पड़ रहा है। अगर हम आवाज़ उठाते हैं तो बच्चों को स्कूल से निकालने की बात कही जाती है। प्रशासन को इस पर तुरंत लगाम लगानी चाहिए।”

— एक पीड़ित अभिभावक
​इस मामले में अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के आला अधिकारी इन बेलगाम विद्यालय संचालकों पर क्या कार्रवाई करते हैं या फिर ये “व्यापार” इसी तरह चलता रहेगा।


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