✍️सेवा में संजोई मां की स्मृतियां, बुज़ुर्गों के बीच बैठकर लिया आशीर्वाद✍️

✍️सेवा में संजोई मां की स्मृतियां, बुज़ुर्गों के बीच बैठकर लिया आशीर्वाद✍️
समाजसेविका कृष्णावती सिंह की तीसरी स्मृति पुण्यतिथि पर बिना दिखावे की मानवीय आयोजन
क्रॉसर-आईटीआई परिसर स्थित वृद्ध आश्रम में परिवार संग पहुंचे शिक्षक अरुणेंद्र सिंह चौहान
क्रॉसर- कंबल नहीं, संवेदना ओढ़ाकर दी गई मां को सच्ची श्रद्धांजलि
✍️रायबरेली। आज के समय में जब सेवा भी कई बार प्रचार और प्रदर्शन की मोहताज हो जाती है, ऐसे दौर में मां की स्मृति को निःस्वार्थ कर्म से जीवित रखना अपने आप में एक मिसाल है। कड़ाके की ठंड के बीच समाजसेवा को आत्मीयता और संवेदना का स्वरूप देते हुए राना बेनी माधव सिंह स्मारक समिति शंकरपुर के संयोजक एवं पेशे से शिक्षक अरुणेंद्र सिंह चौहान ने यह साबित किया कि सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, कर्मों से दी जाती है। अपनी समाजसेवी मां कृष्णावती सिंह की तीसरी स्मृति पुण्यतिथि पर उन्होंने बिना किसी मंच, बैनर या औपचारिकता के सेवा को ही स्मृति का माध्यम बनाया। शुक्रवार को शहर के आईटीआई लिमिटेड प्रांगण में संचालित वृद्ध आश्रम में आयोजित स्मृति दिवस समारोह के दौरान अरुणेंद्र सिंह चौहान अपने परिवार के साथ वृद्धजनों के बीच पहुंचे। यहां 40 वृद्ध महिलाओं और 32 वृद्ध पुरुषों सहित आश्रम में उपस्थित अन्य लोगों को कड़ाके की ठंड से राहत देने के लिए कंबल वितरित किए गए।
इस दौरान वे परिवार सहित बुज़ुर्गों के बीच ज़मीन पर बैठकर उनसे संवाद करते नजर आए—उनका हालचाल जाना, जीवन की बातें सुनीं और आत्मीयता से उनके सुख-दुख में सहभागी बने।इस भावनात्मक अवसर पर अरुणेंद्र सिंह चौहान की धर्मपत्नी श्रीमती डाली सिंह, पुत्री अनन्या सिंह और पुत्र आयुष्मान सिंह चौहान ने भी अपनी दादी की स्मृति में बुज़ुर्गों को अपने हाथों से कंबल ओढ़ाए। बच्चों ने बुज़ुर्गों से आशीर्वाद लिया, नए वर्ष की शुभकामनाएं दीं और उनके दीर्घायु जीवन की कामना की। यह दृश्य केवल सहायता का नहीं, बल्कि संस्कारों की उस परंपरा का प्रतीक बन गया, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है।बताया जाता है कि दिवंगत कृष्णावती सिंह जीवन भर समाजसेवा के प्रति समर्पित रहीं। जरूरतमंदों की मदद, बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान और मानवीय संवेदना उनके जीवन का मूल भाव था। उन्हीं मूल्यों को आत्मसात करते हुए अरुणेंद्र सिंह चौहान ने सेवा को औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पारिवारिक कर्तव्य की तरह निभाया।
इस अवसर पर अरुणेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि मां कृष्णावती सिंह ने हमें सिखाया था कि मानव सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है। उनकी स्मृति में बुज़ुर्गों के बीच बैठकर उन्हें कंबल ओढ़ाना और उनका आशीर्वाद लेना, हमारे लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। कंबल पाकर वृद्धजनों के चेहरों पर संतोष, सुरक्षा और अपनत्व की झलक साफ दिखाई दी। आश्रम परिसर में मौजूद हर व्यक्ति इस दृश्य का साक्षी बन भावविभोर नजर आया। उपस्थित लोगों ने इस पहल को बिना दिखावे की सच्ची समाजसेवा बताते हुए इसे समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत करार दिया। यह आयोजन यह संदेश देकर गया कि मां की स्मृतियां फूलों से नहीं, बल्कि संवेदना, सेवा और संस्कारों से अमर होती हैं✍️
✍️पत्रकार रितिक तिवारी की रिपोर्ट ✍️



